Om Jai Shiv Omkara : शिवजी की आरती गायें महाशिवरात्रि पूजा के दौरान

महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर भगवान शिव की पूजा के समय उनकी आरती का गान अत्यंत महत्व होता है। इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवजी की आरती (Om Jai Shiv Omkara) एक भक्ति गीत है जो भगवान शिव पर आधारित है। बहुत से लोग नियमित रूप से अथवा महाशिवरात्रि जैसे विशेष त्योहारों पर व अन्य त्योहारों में भी शिव आरती का पाठ करते हैं।

इस साल 2024 में, महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 8 मार्च को शाम 9 बजकर 57 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन, यानी 9 मार्च को सुबह 6 बजकर 17 मिनट तक चलेगी।

भगवान शिव को हिंदू धर्म में सर्वोच्च माना जाता है। ‘शिव’ शब्द का अर्थ ‘शुद्ध और संहारक’ होता है। उन्हें त्रिमूर्ति के बीच संहारक के रूप में जाना जाता है। वे योगियों के देवता हैं और कैलाश पर्वत पर तपस्वी जीवन जीते हैं। शिव को ‘महादेव’, ‘पशुपति’, ‘भैरव’, ‘विश्वनाथ’, ‘भोले नाथ’, ‘शंभू’, और ‘शंकर’ नामों से जाना जाता है। वे ब्रह्मांडीय नर्तक हैं और ‘नटराज’ के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।

Om Jai Shiv Omkara -शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। शिव पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव.॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। प्रभु दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखते। त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी। शिव मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद चंदा, सोहे त्रिपुरारी॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। शिव बाघम्बर अंगे।
ब्रह्मादिक सनकादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। शिव कर में त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। प्रभु प्रेम सहित गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥

Om Jai Shiv Omkara आरती के हिंदी अर्थ

“ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
ओंकार के साथ शिव की जय हो, प्रभु शिव की जय हो।
ब्रह्मा, विष्णु, और सदाशिव – जो हमेशा के लिए अविनाशी हैं, और जिनके शरीर के आधा भाग के रूप में धारण किया गया है।हे महादेव, हर हर हर कहते हुए नमस्कार करता हूं।

“एकानन चतुरानन पंचानन राजे। शिव पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“वह जिसका एक मुख है, और जो चार मुखों वाले हैं, उस पंचानन राजा को नमस्कार। शिव, जिनके पास पांच मुख हैं, उन पंचानन राजा को नमस्कार।
हंसासन, गरुड़ वाहन, और वृषभ वाहन के साथ अभिन्न बैठे हैं।
ॐ हर हर हर महादेव – हे महादेव, हर हर हर कहते हुए नमस्कार करता हूं।”

“दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। प्रभु दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखते। त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“जो दो हाथ, चार हाथ और दस हाथों वाले हैं, वह बहुत ही सुंदर हैं। प्रभु, जिनके दस हाथ बहुत ही सुंदर हैं।
तीनों रूप को देखने में सक्षम होते हैं, जो तीनों लोकों को मोहित करते हैं।
हे महादेव, हर हर हर कहते हुए नमस्कार करता हूँ।”

“अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी। शिव मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद चंदा, सोहे त्रिपुरारी॥ ॐ हर हर हर महादेव॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“वह जो अक्षमाला, बनमाला, और मुण्डमाला धारण करते हैं, उस शिव को नमस्कार। चंदन और मृगमद का सुगंध धारण करते हुए त्रिपुरारी (तीनों लोकों के भगवान) बहुत ही सुंदर दिखाई देते हैं।

“श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। शिव बाघम्बर अंगे।
ब्रह्मादिक सनकादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव
॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“जो श्वेत वस्त्र, पीला वस्त्र और बाघम्बर कपड़े पहनते हैं, उनके शिव को नमस्कार। जो ब्रह्मा आदि, सनकादि ऋषि और भूतादि सभी भूतों के संग हैं, उन शिव को नमस्कार।

“कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। शिव कर में त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ हर हर हर महादेव॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“जो कर के बीच कमंडल, चक्र और त्रिशूल धारण करते हैं, उनके हाथ में त्रिशूल है।
जो संसार का निर्माता, संसार का हरण करने वाला और संसार की रक्षा करने वाले हैं।
हे महादेव, नमस्कार करता हूँ।”

“ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“जो ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को नहीं जानते, वे अविवेकी हैं। प्रणवाक्षर के मध्य में ये तीनों एक हैं।”

“त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। प्रभु प्रेम सहित गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥”

इस श्लोक का अर्थ है:
“जो कोई भी मनुष्य त्रिगुणात्मक शिवजी की आरती गाता है, वह प्रभु के प्रेम के साथ गाता है।
शिवानन्द स्वामी कहते हैं कि वह व्यक्ति अपनी मनोकामना को पूरा करता है॥”

शिवजी की आरती (Om Jai Shiv Omkara) Pdf


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