मोक्ष vs मुक्ति: जानिए मोक्ष और मुक्ति में क्या है अंतर !

मोक्ष और मुक्ति, ये दोनों ही शब्द साधना, ध्यान, और आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से आत्मा की स्वतंत्रता की ओर प्रेरित करने वाले एक लक्ष्य की ओर इशारा करते हैं। व्यक्ति अपने परिवार के मृतकों के लिए मुक्ति या मोक्ष की कामना करता है, और अक्सर मुक्ति और मोक्ष को एक ही समझा जाता है।

हालांकि, सामान्यत: इसका अर्थ है कि जन्म-मरण से मुक्त होना ही मुक्ति या मोक्ष है। चलिए जानते हैं इन दोनों के बीच के अंतर को। इस ब्लॉग में, हम दोनों शब्दों के अर्थ, उनके अंतर, और इसे प्राप्त करने के उपायों को गहराई से जानेंगे।

मुक्ति का अर्थ । Meaning of Mukti

मुक्ति का अर्थ है जब कोई व्यक्ति मरता है, तो उसकी सद्गति के लिए उसके परिवार श्राद्ध या तर्पण करते हैं। यहां कहा जाता है कि व्यक्ति जीवन के कर्मों के आधार पर अगले जन्म में पशु, पक्षी, या प्रेत बन सकता है और उसके लिए मुक्ति, अर्थात मोक्ष प्राप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसमें ब्रह्मकपाली में अंतिम कर्म करने का उल्लेख होता है। मुक्ति का यह परिप्रेक्ष्य अधिक भौतिक है और व्यक्ति को भविष्य के जन्म में मुक्त करने का प्रयास करता है।

मुक्ति के प्रकार

मुक्ति, कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करने की यह स्थिति व्यक्ति को जीवन के विभिन्न पथों से प्राप्त हो सकती है। मुक्ति के चार प्रमुख प्रकार होते हैं, जिनमें हर एक का अपना विशेषता है:

  • सालोक्य (सगुण मुक्ति): इसमें जीव भगवान के साथ उनके लोक में वास करता है और भगवान की सेवा करता है। यह एक प्रेमभरा और भक्ति पूर्ण स्थिति है।
  • सामीप्य (सगुण मुक्ति): इसमें जीव भगवान के सन्निध्य में रहता है और उसके साथ भगवान की लीला का आनंद लेता है, भगवान के साथ एकता का भाव रखता है।
  • सारूप्य (निर्गुण मुक्ति): इसमें जीव भगवान के समान रूप धारण करता है और उसके साथ अनुभूतियां करता है, अपनी आत्मा को भगवान की आत्मा से एकरूपता में अनुभव करता है।
  • सायुज्य (निर्गुण मुक्ति): इसमें जीव भगवान में सम्पूर्णता के साथ लीन हो जाता है और अपनी आत्मा को भगवान की आत्मा में समाहित करता है, जिससे उसे अद्वितीयता की अनुभूति होती है

ये चार प्रकार के मुक्ति जीव को आत्मा की स्वतंत्रता और परमात्मा के साथ सम्बन्ध में उन्नति की ओर मार्गदर्शन करते हैं।

मोक्ष क्या है ? । What is Moksh ?

विराट धारणा के अनुसार, मोक्ष व्यक्ति को भगवान के समान बनाने का उद्दीपन करता है। यह आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने का प्रयास करता है और उसे अनन्त आनंद, शांति, और सर्वोत्तम सत्य की प्राप्ति की दिशा में प्रेरित करता है। मोक्ष का मतलब है सब बंधनों से मुक्त होकर आत्मा को उसके असली स्वरूप में ले जाना। इसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को आत्म-समर्पण, योग, तपस्या, और सेवा के माध्यम से आत्मा को संयमित करने का प्रयास करना पड़ता है। मोक्ष विशेषतः आध्यात्मिक उन्नति की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मोक्ष का अर्थ:

मोक्ष का अर्थ सिर्फ जन्म और मरण के बंधन से मुक्त हो जाना ही नहीं है। इस अवस्था में, व्यक्ति सम्पूर्ण संसारिक चक्र से बाहर निकलकर भूख, प्यास, सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, जैसे सभी द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है। ध्यान, साधना, और साक्षात्कार के माध्यम से व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति के लिए साक्षर और आत्म-समर्पण का पथ तय करता है, जिससे उसका आत्मा अनंत आनंद, शांति, और सर्वोत्तम सत्य में समाहित हो जाता है।

आत्मा को ब्रह्मस्वरूप मानना गया है। “अहं ब्रह्मास्मि” का ज्ञान प्राप्त होना आवश्यक है, और यही मोक्ष की प्राप्ति है। इस ज्ञान के प्राप्त होने पर आत्मा सत्य, चित्त, और आनंद से पूर्ण हो जाती है।

विवेकचूडामणि में कहा गया है-

जातिनीतिकुल-गोत्र-दूरगं नामरूपगुणदोषवर्जितम् ।
देशकालविषयातिवर्ति यद्ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥२५४॥

मोक्ष प्राप्त कैसे प्राप्त करें ?

मोक्ष प्राप्त करने के लिए विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में विभिन्न मार्ग बताए गए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख मार्गों को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है:

भक्तियोग:

  • मोक्ष प्राप्त करने के लिए भगवान की पूजा, भक्ति, और सेवा का अभ्यास किया जाता है।
  • इस मार्ग में भक्त अपनी पूजा और आराधना के माध्यम से ईश्वर के साथ एकता की अनुभूति करने का प्रयास करता है।
  • भक्ति में भावनाओं के साथ ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण होता है।

ज्ञानयोग:

  • ज्ञानयोग में, आत्मज्ञान के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है।
  • आत्मा की असलीता को समझने और उससे जुड़े सभी बंधनों को छोड़ने की कठिनाओं का सामना किया जाता है।
  • गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ज्ञानी व्यक्तियों से ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

कर्मयोग:

  • कर्मयोग में, कर्मों को निष्काम भाव से किया जाता है, जिससे बंधनों से मुक्ति होती है।
  • कर्मयोगी अपने कर्मों को ईश्वर के लिए समर्पित करता है और फलों की चिंता नहीं करता।

ध्यानयोग:

  • इस मार्ग में, ध्यान और मेधावीता के माध्यम से मन को नियंत्रित करके आत्मा का अध्ययन किया जाता है।
  • ध्यानयोगी आत्मा की अंतर्दृष्टि में समर्थ होने का प्रयास करता है।

मोक्ष और मुक्ति में क्या अंतर के तालिका

परामर्शित शब्दमुक्तिमोक्ष
अर्थबंधनों से मुक्तिआत्मा की पूर्णता, भगवान के साथ एकता
प्राप्तिअधिकांशत: जीवन मेंआत्मा को पूर्णता की स्थिति में प्राप्ति
परंपरागत सुचनाहिन्दू धर्म और जैन धर्म में व्याप्तविभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं और धाराओं में पाया जाता है
मुक्ति का प्रकारविभिन्न प्रकार की मुक्तियां जैसे सालोक्य, सारूप्य, सायुज्यमोक्ष की मार्ग हैं- कर्मयोग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।
उदारवादसामान्यत: बंधनों से मुक्ति मिलने की कामनाआत्मा को परमात्मा के साथ एक होने की कामना
उद्देश्यजीवन में सुख और शांतिमोक्ष, संसारिक बंधनों से मुक्ति, आत्मा की मुक्ति

FaQ’s

चार प्रकार की मुक्ति कौन सी है?

मुक्ति चार प्रकार हैं: 1)सालोक्य,2) सामीप्य, 3)सारूप्य, 4)और सायुज्य हैं।

मृत्यु और मोक्ष में क्या अंतर है?

मोक्ष प्राप्त करने के बाद, आत्मा को स्वतंत्रता का अनुभव होता है, जबकि निर्वाण का उद्देश्य शारीरिक रूप से बने रहते हुए विश्ववादी इच्छाओं और माया के जाल से मुक्ति प्राप्त करना है।

मुक्ति के कितने मार्ग हैं?

मुक्ति के 4 मार्ग हैं- कर्मयोग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।

मोक्ष में कितने जीव है?

धर्मग्रंथों में यह कहा गया है कि जीवात्मा को 84 लाख योनियों में जन्म लेना पड़ता है। जीव तब तक इस संसार में फिरता रहता है, जब तक कि उसे मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाता।


Leave a Comment

Ads Blocker Image Powered by Code Help Pro

Ads Blocker Detected!!!

We have detected that you are using extensions to block ads. Please support us by disabling these ads blocker.

Powered By
100% Free SEO Tools - Tool Kits PRO