shiv raksha stotra | शिव रक्षा कवच स्तोत्र

सनातन धर्म में सोमवार को महादेव और पार्वती की विशेष पूजा होती है। इस दिन भगवान शिव के व्रत भी रखे जाते हैं। उनकी पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं, विवाहित महिलाओं को सौभाग्य और अविवाहितों को जल्दी शादी का योग मिलता है। भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए सोमवार को शिव रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। यह स्त्रोत सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है।

शिव रक्षा स्तोत्र (Shiv Raksha Stotra) अर्थ सहित | शिव रक्षा कवच Lyrics

विनियोग-ॐ अस्य श्री शिवरक्षास्तोत्रमंत्रस्य याज्ञवल्क्यऋषिः,
श्री सदाशिवो देवता, अनुष्टुपछन्दः श्री सदाशिवप्रीत्यर्थं शिव रक्षा स्तोत्रजपे विनियोगः।

“विनियोग” शब्द का हिंदी में अर्थ होता है ‘उपयोग’ या ‘प्रयोग’। इसे किसी मंत्र, स्तोत्र या पूजा के प्रारम्भ में पढ़ा जाता है ताकि वह कार्य शुभ हो और साधक को समर्पितता का भाव बनाए रखने में मदद मिले।

अर्थात, यह मंत्र शिव रक्षा स्तोत्र का जाप करने के लिए उपयुक्त है, जिसके ऋषि याज्ञवल्क्य हैं, देवता श्री सदाशिव (भगवान शिव) हैं, छंद अनुष्टुप है और इसका प्रयोजन श्री सदाशिव की प्रीति के लिए है।

चरितम् देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारम् परमोदारम् चतुर्वर्गस्य साधनम् ।1।

इस श्लोक का अर्थ हैं, भगवान महादेव का चरित्र परम पवित्र हैं, जो चारों वर्ण (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की सिद्धि में सहायक है। उनका दर्शन अतीब अतीव है और उनकी उदारता की कोई सीमा नहीं है।

गौरी विनायाकोपेतम् पंचवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवम् ध्यात्वा दशभुजम् शिवरक्षां पठेन्नरः।2।

जिस पर गौरी और विनायक उपस्थित हैं, पाँच मुख और तीन नेत्रों वाले,
वह शिव को ध्यान में लेकर (दस भुजाओं वाले भगवान की ) शिव रक्षा स्तोत्र पठे।

गंगाधरः शिरः पातु भालमर्धेन्दु शेखरः।
नयने मदनध्वंसी कर्णौ सर्पविभूषणः ।3।

गंगाधर, जो गंगा को जटाजूट में धारण करने वाले हैं, मेरे मस्तक की रक्षा करें।
अर्धेन्दुशेखर, जो अर्धचंद्र को धारण करने वाले हैं, मेरे ललाट की रक्षा करें।
मदनदहन, जो मदन को ध्वंस करने वाले हैं, मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें।
सर्पविभूषण, जो सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले हैं, मेरे कानों की रक्षा करें।

घ्राणं पातु पुरारातिर्मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कन्धरां शितिकन्धरः ।4।

त्रिपुरासुर के विनाशक पुराराति, मेरे घ्राण (नाक) की संरक्षा करें।
जगत की रक्षा करने वाले जगत्पति, मेरे मुख की संरक्षा करें।
वाणी के स्वामी वागीश्वर, मेरी जिह्वा की संरक्षा करें।
शितिकन्धर (नीलकण्ठ), मेरी गर्दन की संरक्षा करें।

श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।
भुजौ भूभार संहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ।5।

श्रीकण्ठ, जिनके कण्ठ में सरस्वती, यानी वाणी निवास करती है, मेरे कण्ठ की संरक्षा करें।
विश्वधुरन्धर, जो विश्व की धुरी को धारण करते हैं, मेरे दोनों कंधों की संरक्षा करें।
भूभारसंहर्ता, जो पृथ्वी के भारस्वरूप दैत्यों का संहार करते हैं, मेरी दोनों भुजाओं की संरक्षा करें।
पिनाकधारी, जो पिनाक (शिव का त्रिशूल) धारण करते हैं, मेरे दोनों हाथों की संरक्षा करें।

हृदयं शङ्करः पातु जठरं गिरिजापतिः।
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्रजिनाम्बरः ।6।

शङ्कर (भगवान शिव) हृदय की संरक्षा करें, गिरिजापति (पार्वतीपति) जठर की संरक्षा करें।
मृत्युंजय (जो मृत्यु को जीतने वाले हैं) नाभि की संरक्षा करें, व्याघ्रजिनाम्बर (जो बाघ की चमड़े की ओढ़ाई पहनते हैं) कटी की संरक्षा करें।

सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागत वत्सलः।
उरु महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ।7।

जिनकी शरण में आते हैं, वह दीनार्त का पालनहार सक्थिनी (हड्डियों) की संरक्षा करें।
महेश्वर, जो ऊरू की संरक्षा करते हैं, वह जगदीश्वर जानुओं की संरक्षा करें।

जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिन्धुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ।8।

जगत्कर्ता, मेरे जंघाओं की संरक्षा करें। गणाधिप, दोनों गुल्फों (एड़ी की ऊपरी ग्रंथि) की संरक्षा करें। करुणासिन्धु, दोनों चरणों की संरक्षा करें। और भगवान सदाशिव, मेरे सभी अंगों की संरक्षा करें।

एताम् शिवबलोपेताम् रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्।9।

जो सुकृती (पुण्य के फल) से यह शिवबल संपन्न रक्षा पठता है,
वह सभी कामनाओं को पूर्ण करके शिव के सायुज्य को प्राप्त होता है।

गृहभूत पिशाचाश्चाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये।
दूराद् आशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात्।10।

जो पिशाच और अन्य भूत-प्रेत लोक में घरों में घूमते हैं,
वे शिव के नाम की रक्षा के कारण त्वरित दूर जाते हैं।

अभयम् कर नामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ।11।

पार्वतीपति (भगवान शिव) का यह नाम अभय कवच है।
जो इसे भक्ति से अपने कंठ पर धारण करता है, उसका वशीकरण त्रिलोकी (तीनों लोक) को होता है।

इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽदिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथाऽलिखत् ।12।

नारायण ने स्वप्न में शिवरक्षा की यह विधि दिखाई।
प्रातः जागकर योगीन्द्र याज्ञवल्क्य ने भी ऐसा ही लिखा।

। इति श्री शिवरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम ।

यहाँ सम्पूर्ण श्री शिवरक्षा स्तोत्र समाप्त होता है।

श्री शिव पञ्चकम् स्तोत्र

shiv raksha stotra शिव रक्षा कवच स्तोत्र - श्री शिव पञ्चकम् स्तोत्र

श्री शिव पञ्चकम् स्तोत्र

प्रालेयाचलमिन्दुकुन्दधवलं गोक्षीरफेनप्रभं
भस्माभ्यङ्गमनङ्गदेहदहनज्वालावलीलोचनम् ।
विष्णुब्रह्ममरुद्गणार्चितपदं ऋग्वेदनादोदयं
वन्देऽहं सकलं कलङ्करहितं स्थाणोर्मुखं पश्चिमम् ॥ १॥

गौरं कुङ्कुमपङ्किलं सुतिलकं व्यापाण्डुकण्ठस्थलं
भ्रूविक्षेपकटाक्षवीक्षणलसत्संसक्तकर्णोत्पलम् ।
स्निग्धं बिम्बफलाधरं प्रहसितं नीलालकालङ्कृतं
वन्दे याजुषवेदघोषजनकं वक्त्रं हरस्योत्तरम् ॥ २॥

संवर्ताग्नितटित्प्रतप्तकनकप्रस्पर्द्धितेजोमयं
गम्भीरध्वनि सामवेदजनकं ताम्राधरं सुन्दरम् ।
अर्धेन्दुद्युतिभालपिङ्गलजटाभारप्रबद्धोरगं
वन्दे सिद्धसुरासुरेन्द्रनमितं पूर्वं मुखं शूलिनः ॥ ३॥

कालाभ्रभ्रमराञ्जनद्युतिनिभं व्यावृत्तपिङ्गेक्षणं
कर्णोद्भासितभोगिमस्तकमणि प्रोत्फुल्लदंष्ट्राङ्कुरम् ।
सर्पप्रोतकपालशुक्तिसकलव्याकीर्णसच्छेखरं
वन्दे दक्षिणमीश्वरस्य वदनं चाथर्ववेदोदयम् ॥ ४॥

व्यक्ताव्यक्तनिरूपितं च परमं षट्त्रिंशतत्त्वाधिकं
तस्मादुत्तरतत्वमक्षरमिति ध्येयं सदा योगिभिः ।
ओङ्कारदि समस्तमन्त्रजनकं सूक्ष्मातिसूक्ष्मं
परं वन्दे पञ्चममीश्वरस्य वदनं खव्यापितेजोमयम् ॥ ५॥

एतानि पञ्च वदनानि महेश्वरस्य ये कीर्तयन्ति पुरुषाः सततं प्रदोषे ।
गच्छन्ति ते शिवपुरीं रुचिरैर्विमानैः क्रीडन्ति नन्दनवने सह लोकपालैः ॥

॥ इति शिवपञ्चाननस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शिव रक्षा स्तोत्र के फायदे

शिव रक्षा स्तोत्र के पाठ से विभिन्न प्रकार के फायदे होते हैं। यहां कुछ मुख्य फायदे हैं:

  • मनोकामनाओं की पूर्ति: शिव रक्षा स्तोत्र के पाठ से साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • सुख और सौभाग्य: इस स्तोत्र के पाठ से विवाहित महिलाओं को सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
  • शीघ्र विवाह: अविवाहित जातकों की शीघ्र शादी के योग बनते हैं।
  • शिव की कृपा: भगवान शिव के प्रति भक्ति और आराधना करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।

शिव रक्षा स्तोत्र Pdf

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स्रोत क्या हैं ?

संस्कृत साहित्य में, स्तोत्र एक विशेष रूप का काव्य होता है जो देवी-देवता की स्तुति में लिखा जाता है। यह स्तुति के माध्यम से भक्त ईश्वर की आराधना करता है और उनकी कृपा को प्राप्त करता है। महाकवि कालिदास के अनुसार, “स्तोत्रं कस्य न तुष्टये” का अर्थ है कि स्तुति और स्तोत्र में ईश्वर की स्तुति करने से वह सचमुच प्रसन्न हो जाते हैं।

भगवान शिव के कितने स्तोत्र हैं?

भगवान शिव के कई प्रमुख स्तोत्र हैं जो उनकी महिमा, कृपा और आराधना को व्यक्त करते हैं। उनमें से कुछ प्रमुख स्तोत्र हैं जैसे कि:
शिव महिम्न स्तोत्र,महामृत्युंजय मंत्र,शिव ताण्डव स्तोत्र,शिव रक्षा स्तोत्र ,शिव पंचाक्षर स्तोत्र

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