हिन्दू धर्म में बलि प्रथा से जुड़ी वेद – महाभारत के सभी श्लोक

हिन्दू धर्म में बलि प्रथा: हिन्दू धर्म, जो विश्व के एक प्राचीन और अमूल्य धर्म के रूप में जाना जाता है, विविधता और विविधताओं का एक समृद्ध खजाना है। इस धर्म के भीतर, हजारों वर्षों की परंपराओं और संस्कृतियों का समावेश है, जिसने इसे विश्व की एक प्रमुख और सांस्कृतिक धारा बनाया है। इस धारा के अंतर्गत, कई ऐसी प्रथाएं हैं जो विभिन्न समाजों और क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में मनाई जाती हैं, जो स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसका एक उदाहरण है बलि प्रथा, जिसे हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण और विवादित विषय के रूप में देखा जाता है।

हिन्दू धर्म में बलि प्रथा

बलि प्रथा हिन्दू धर्म में एक प्राचीन प्रथा है जिसमें देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि या बलिदान दिया जाता है। इस प्रथा के अंतर्गत, बकरा, मुर्गा, भैंसे आदि पशुओं की बलि दी जाती है। विशेष रूप से, मां काली और काल भैरव जैसे देवताओं को बलि चढ़ाई जाती है। इस प्रथा को समर्थन करने के लिए कई तरह के तर्क दिए जाते हैं, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक हैं।

वेदों में बलि प्रथा

बलि प्रथा और हिन्दू धर्म:

‘मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।”- ऋग्वेद 1/114/8

यह वेद मंत्र कहता है कि हमें गायों और घोड़ों को नहीं मारना चाहिए।

कुछ विद्वान मानते हैं कि बलि प्रथा हिन्दू धर्म का एक अभिन्न हिस्सा है, जबकि अन्य विद्वान इसे धर्मविरुद्ध और अस्वीकृत करते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में बलि प्रथा को स्वीकार नहीं किया गया है, और यह आधारित है कि यह धार्मिक आधार पर समर्थित नहीं है।

बलि प्रथा के विरुद्ध तर्क:

”इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्।
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम।।”

अर्थ : यह ऋग्वेद का एक श्लोक है, जो अग्नि, अग्निदेवता, को समर्पित है। इसमें यह प्रार्थना की गई है कि अग्नि हमारे और सभी प्राणियों की रक्षा करे, जिनमें दो पैर (मनुष्य) और चार पैर (पशु) शामिल हैं, साथ ही पृथ्वी और सम्पूर्ण सृष्टि की। इसके साथ ही, यह उत्कृष्ट आकाश में किसी भी प्राणी को क्षति न पहुंचाए के लिए अग्नि से प्रार्थना की गई है।

वेदों में बलि प्रथा के खिलाफ कई मंत्र और ऋचाएं हैं जो इसे निषेध करती हैं। एक ऐसा मंत्र है ऋग्वेद 1/114/8, जो कहता है, “मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।” यहां पशुओं की हत्या को निषेधित किया गया है, जो बलि प्रथा का विरोध करता है।

बलि प्रथा का निषेध:

‘न कि देवा इनीमसि, न क्या योपयामसि।
मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।।” – सामवेद-2/7

यह श्लोक सामवेद से उद्धृत है और इसका अर्थ है कि हमें देवताओं के प्रति हिंसा नहीं करनी चाहिए, और न ही हमें उनके प्रति अशुभ कार्य करने चाहिए। बल्कि, हमें केवल वेद मंत्रों के आदेशों का पालन करना चाहिए।

वेदों में बलि प्रथा का स्पष्ट निषेध है, और यह हिन्दू धर्म के आधारभूत सिद्धांतों के विपरीत है। धार्मिक दृष्टिकोण से, बलि प्रथा को अस्वीकृत किया जाता है क्योंकि यह अहिंसा के मार्ग के खिलाफ है, जो हिन्दू धर्म का मौलिक तत्त्व है। वेदों में स्पष्ट रूप से उचित धर्म के नाम पर ऐसी किसी भी प्रथा का समर्थन नहीं किया गया है।

महाभारत में बलि प्रथा

महाभारत के अनुसार, वेदों में पशुबलि का विधान नहीं है, धूर्तों द्वारा वेदों में पशुबलि शुरू करने का संकेत है।भारत में यज्ञों का प्रचलन कबसे शुरू हुआ उसके बारे में कोई निश्चित तिथि तो शायद ही कोई बता पाए। समय के साथ यज्ञ के तरीक़े एवं उद्देश्यों में यथासम्भव परिवर्तन हुआ है। वैदिककालीन यज्ञों में पशुबलि तक का ज़िक्र मिलता है लेकिन पशुबलि के संदर्भ में महाभारत का यह अंश सभी को पढ़ना चाहिए। इस अध्याय का नाम इस प्रकार है- ‘राजा विचख्नु के द्वारा अहिंसा-धर्म की प्रशंसा’।

इस अध्याय में पशुहिंसा एवं बलि के संदर्भ में अहिंसा के बारे में भीष्म, युधिष्ठिर को राजा विचख्नु के प्रसंग के माध्यम से बता रहे हैं।

उदाहरण श्लोक:

  1. अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरै:
    संशयात्मभिरव्यक्तौर्हिंसा समनुवर्णिता॥
    (शांतिपर्व 265.4)

अर्थ: जो धर्म की मर्यादा से भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं तथा जिन्हें आत्मा के विषय में संदेह है एवं जिनकी कहीं प्रसिद्धि नहीं है, ऐसे लोगों ने ही हिंसा का समर्थन किया है।

  1. सुरा मत्स्या मधु मांसमासवं कृसरौदनम्।
    धूर्तै: प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम्॥
    (शांतिपर्व 265.9)

अर्थ: सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावल की खिचड़ी- इन सब वस्तुओं काे धूर्तों ने यज्ञ में प्रचलित कर दिया है। वेदों में इनके उपयोग का विधान नहीं है।

  1. मानान्मोहाच्च लोभाच्च लौलरूमेतत्प्रकल्पितम्।
    (शांतिपर्व 9 1/2)

अर्थ: उन धूर्तों ने अभिमान, मोह और लोभ के वशीभूत होकर उन वस्तुओं के प्रति अपनी यह लोलुपता ही प्रकट की है।

  1. विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणा:।
    पायसै: सुमनोभिश्च तस्यापि यजनं स्मृतम्॥
    (शांतिपर्व 265.10, 10 1/2)

अर्थ: ब्राह्मण तो सम्पूर्ण य

ज्ञों में भगवान विष्णु का ही आदर भाव मानते हैं और खीर तथा फूल आदि से ही उनकी पूजा करते हैं। यानी महाभारत के अनुसार, यज्ञों में धूर्त व्यक्तियों ने पशुबलि का विधान शुरू किया है।

समाप्ति

यह सर्वविदित है कि वेद सबसे प्राचीन हैं और महर्षि वेदव्यास ने ही उनका सम्पादन किया था। यानी महर्षि ने जब महाभारत में इस बात का उल्लेख किया है कि धूर्तों ने मांस का प्रचलन यज्ञों में किया है तो इसका अर्थ यह है कि उस समय तक विकृतियां यज्ञों में आ चुकी थीं, लेकिन साथ ही साथ मनीषियों ने इसका विरोध भी किया।

नोट: इस लेख का उद्देश्य संदर्भों की सामग्री के साथ विचारों को साझा करना है, इसमें किसी विशेष धार्मिक या सांस्कृतिक धारणा को आघात नहीं पहुंचाना है।

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