रोग नाशक बीज मंत्र । रोग निवारण बीज मंत्र

रोग नाशक बीज मंत्र: का उपयोग समय से पूर्व ही भारतीय आयुर्वेद में किया जाता रहा है। यह मंत्र सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है और स्वास्थ्य को संतुलित रखने में मदद कर सकता है। बीज मंत्रों का उच्चारण करने से शारीरिक, मानसिक, और आध्यात्मिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। इस ब्लॉग में, हम रोग नाशक बीज मंत्र के महत्व और उनके उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करेंगे।

बीज मंत्रों का प्रयोग विभिन्न रोगों के उपचार में एक प्रमुख उपाय के रूप में किया जाता है। यह आध्यात्मिक और तांत्रिक शास्त्रों में प्राचीन समय से ही उपयोग किया जाता रहा है। बीज मंत्रों का उच्चारण और मनन ध्यान की अभ्यास के माध्यम से किया जाता है, जिससे शरीर, मन, और आत्मा का संगठन होता है।

जब कोई व्यक्ति निश्चित लय और ताल से मंत्र का जप करता है, तो उससे उसके शरीर में नाडियों में गतिशीलता और ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा षट् चक्रों को जागृत करती है और शरीर के विभिन्न केंद्रों में संतुलन को स्थापित करती है। इस प्रक्रिया से शरीर में प्राणिक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे हार्मोन्स का संतुलन बना रहता है और शरीर की संरचना और क्रियावली में समानुपातिकता आती है।

रोग नाशक बीज मंत्र । रोग निवारण बीज मंत्र

  • कां (Kam): पाचन संबंधी विकारों में प्रभावी है और विशेष रूप से आंतों की सूजन को कम करने में सहायक है।
  • गुं (Gum): कोलन और मूत्र प्रणाली से संबंधित बीमारियों में उपयोगी है।
  • शं (Sham): वाणी के दोष, नींद की बाधाएं, महिलाओं में गर्भाशय संबंधित समस्याएँ, और हर्निया जैसे रोगों में उपयोगी है।
  • घं (Gham): सेक्सुअल इच्छाओं को नियंत्रित करने में मदद करता है और इस्तेमाल की गई होशियारी के नकारात्मक प्रभावों को कम करता है, जैसे मानसिक विकार।
  • ढं (Dham): मानसिक शांति को सहायता प्रदान करता है और अप्रत्याशित संकटों या अध्यात्मिक बलिदान से उत्पन्न होने वाले रोगों में मदद करता है।
  • पं (Pam): टीबी, अस्थमा, और फेफड़ों से संबंधित अन्य रोगों में उपयोगी है।
  • बं (Bam): मधुमेह, उल्टी, पाचन संबंधी समस्याएँ, और जोड़ों के दर्द जैसे रोगों में उपयोगी है।
  • यं (Yam): बच्चों के हाइपरैक्टिव मस्तिष्क को शांत करने में मदद करता है और उनकी ध्यान क्षमता को बढ़ाता है।
  • रं (Ram): पाचन रोगों, यकृत संबंधित विकारों, और बुखार में मददगार है।
  • लं (Lam): अनियमित मासिक धर्म, जननांग संबंधित समस्याएँ, और आलस्य को नियंत्रित करने में मददगार है।
  • मं (Mam): महिलाओं में स्तन संबंधित विकारों में सहायक है।
  • धं (Dham): मानसिक तनाव को कम करने में मददगार है।
  • ऐं (Aim): वातरोग नाशक होता है और उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, और मूर्च्छा जैसी गंभीर बीमारियों में सहायक है।
  • द्वां (Dwam): सभी कान संबंधी रोगों में प्रभावी है।
  • ह्रीं (Hreem): फेफड़ों से होने वाली बीमारियों में सहायक है।
  • ऐं (Aim): जिगर संबंधी बीमारियों में सहायक होता है।
  • वं (Vam): तंत्रिका तंत्र से संबंधित रोगों में सहायक होता है।
  • शुं (Shum): विभिन्न आंत्रिक विकारों और पेट संबंधित अनेक रोगों में सहायक है।
  • हुं (Hum): यह बीज एक प्रभावशाली एंटीबायोटिक के रूप में कार्य करता है। यह गॉल ब्लैडर समस्याओं, पाचन संबंधी समस्याओं, और लीकोरिया जैसी बीमारियों में सहायक है।
  • अं (Am): पथरी, बच्चों के कमजोर मसाने, पेट की जलन, और मानसिक शांति में मदद करता है। इस बीज का लगातार जप करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।

इस तरह रोग नाशक बीज मंत्र के अभ्यास से शरीर में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले हार्मोन्स, एंजाइम्स, और अन्य प्राकृतिक तत्वों का संतुलन बना रहता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और व्यक्ति विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता प्राप्त करता है।

बीज मंत्रों का उच्चारण और मनन न केवल शारीरिक रोगों के उपचार में मददगार होता है, बल्कि यह मानसिक स्थिति में भी स्थिरता और शांति का स्रोत बनता है। इसके अलावा, यह ध्यान और आत्मा की उन्नति में भी सहायक होता है और व्यक्ति को आत्मिक और आध्यात्मिक संवेदना में उन्नति प्रदान करता है।

रोग नाशक (रोग निवारण) बीज मंत्र Pdf


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