ओम भूर्भुव: स्व गायत्री मंत्र का अर्थ

गायत्री मंत्र हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन मंत्र है।ह मंत्र ऋग्वेद में उद्धृत हुआ है और इसके ऋषि विश्वामित्र तथा देवता सविता हैं, और इसका जाप ध्यान और प्रार्थना में व्यापक रूप से किया जाता है। गायत्री मंत्र को सबसे पवित्र मंत्रों में से एक माना जाता है और इसे ‘मंत्रों की माता‘ कहा जाता है। इस मंत्र का उच्चारण आत्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाता है।

ओम भूर्भुव: स्व गायत्री मंत्र का अर्थ

गायत्री मंत्र का शाब्दिक अर्थ

गायत्री मंत्र संस्कृत भाषा में है और इसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार है:

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

  • : यह पवित्र ध्वनि ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करता है और इसे सृष्टि की मूल ध्वनि माना जाता है।
  • भू: यह पृथ्वी का प्रतीक है और भौतिक जगत को दर्शाता है।
  • भुव: यह अंतरिक्ष का प्रतीक है और जीवन शक्ति को दर्शाता है।
  • स्व: यह स्वर्ग का प्रतीक है और आध्यात्मिक संसार को दर्शाता है।
  • तत्: यह उस परम तत्व की ओर इंगित करता है जिसे हम पूजते हैं।
  • सवितुर: यह सविता का प्रतीक है, जो सृष्टिकर्ता है।
  • वरेण्यं: यह उस सर्वोत्तम शक्ति को दर्शाता है जिसे पूज्य माना जाता है।
  • भर्गो: यह दिव्यता और प्रकाश का प्रतीक है।
  • देवस्य: यह देवता का प्रतिनिधित्व करता है।
  • धीमहि: हम उसका ध्यान करते हैं।
  • धियो: यह बुद्धि का प्रतीक है।
  • यो: जो।
  • न: हमें।
  • प्रचोदयात्: प्रेरित करे।

गायत्री मंत्र का भावार्थ

गायत्री मंत्र का भावार्थ निम्नलिखित है:

“हे परमात्मा, हे सूर्यदेव! आप हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें। हमें ज्ञान और बुद्धि प्रदान करें ताकि हम आपके दिव्य प्रकाश को समझ सकें और अपने जीवन को सार्थक बना सकें।”

ओम भूर्भुव स्व गायत्री मंत्र का अर्थ
ओम भूर्भुव स्व गायत्री मंत्र का अर्थ

गायत्री मंत्र का अर्थ व महिमा

गायत्री मंत्र के अर्थ की गम्भीर व्यंजना सम्पूर्ण ऋग्वेद के 10 सहस्र मन्त्रों में सबसे अधिक की गई है। इस मंत्र में 24 अक्षर हैं, जो आठ-आठ अक्षरों के तीन चरणों में विभाजित हैं। इसके पूर्व में तीन व्याहृतियाँ (भूर्भव: स्व:) और प्रणव (ॐ) जोड़कर मंत्र का पूरा स्वरूप स्थिर हुआ है।

गायत्री मंत्र के तत्व

यह मंत्र 24 अक्षरों से मिलकर बना है और इन 24 अक्षरों में 24 अवतार, 24 ऋषि, 24 शक्तियां, 24 सिद्धियां और 24 शक्ति बीज शामिल हैं। यह मंत्र आत्मिक शुद्धि, मानसिक शांति, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके जाप से इन सभी शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।

गायत्री मंत्र में समाहित 24 अक्षर, 24 देवता, 24 शक्तियां और 24 सिद्धियां

क्रम संख्याअक्षरदेवताशक्तिसिद्धि
1तत्गणेशसफलता शक्तिकठिन कामों में सफलता, विघ्नों का नाश, बुद्धि की वृद्धि
2स:नरसिंहपराक्रम शक्तिपुरुषार्थ, पराक्रम, वीरता, शत्रुनाश, आतंक-आक्रमण से रक्षा
3वि:विष्णुपालन शक्तिप्राणियों का पालन, आश्रितों की रक्षा, योग्यताओं की वृद्धि
4तु:शिवकल्याण शक्तिअनिष्ट का विनाश, कल्याण की वृद्धि, निश्चयता, आत्मपरायणता
5व:श्रीकृष्णयोग शक्तिक्रियाशीलता, कर्मयोग, सौन्दर्य, सरसता, अनासक्ति, आत्मनिष्ठा
6रे:राधाप्रेम शक्तिप्रेम-दृष्टि, द्वेषभाव की समाप्ति
7णि:लक्ष्मीधन शक्तिधन, पद, यश और भोग्य पदार्थों की प्राप्ति
8यं:अग्नितेज शक्तिप्रकाश, शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि, प्रतिभाशाली और तेजस्वी होना
9इन्द्ररक्षा शक्तिरोग, हिंसक चोर, शत्रु, भूत-प्रेतादि के आक्रमणों से रक्षा
10र्गोसरस्वतीबुद्धि शक्तिमेधा की वृद्धि, बुद्धि में पवित्रता, दूरदर्शिता, चतुराई, विवेकशीलता
11देदुर्गादमन शक्तिविघ्नों पर विजय, दुष्टों का दमन, शत्रुओं का संहार
12हनुमाननिष्ठा शक्तिकर्तव्यपरायणता, निष्ठावान, विश्वासी, निर्भयता एवं ब्रह्मचर्य-निष्ठा
13स्यपृथिवीधारण शक्तिगंभीरता, क्षमाशीलता, भार वहन करने की क्षमता, सहिष्णुता, दृढ़ता, धैर्य
14धीसूर्यप्राण शक्तिआरोग्य-वृद्धि, दीर्घ जीवन, विकास, वृद्धि, उष्णता, विचारों का शोधन
15श्रीराममर्यादा शक्तितितिक्षा, कष्ट में विचलित न होना, मर्यादापालन, मैत्री, सौम्यता, संयम
16हिश्रीसीतातप शक्तिनिर्विकारता, पवित्रता, शील, मधुरता, नम्रता, सात्विकता
17धिचन्द्रशांति शक्तिउद्विग्नता का नाश, काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिन्ता का निवारण, निराशा के स्थान पर आशा का संचार
18योयमकाल शक्तिमृत्यु से निर्भयता, समय का सदुपयोग, स्फूर्ति, जागरुकता
19योब्रह्माउत्पादक शक्तिसंतानवृद्धि, उत्पादन शक्ति की वृद्धि
20न:वरुणरस शक्तिभावुकता, सरलता, कला से प्रेम, दूसरों के लिए दयाभावना, कोमलता, प्रसन्नता, आर्द्रता, माधुर्य, सौन्दर्य
21प्रनारायणआदर्श शक्तिमहत्वकांक्षा-वृद्धि, दिव्य गुण-स्वभाव, उज्जवल चरित्र, पथ-प्रदर्शक कार्यशैली
22चोहयग्रीवसाहस शक्तिउत्साह, वीरता, निर्भयता, शूरता, विपदाओं से जूझने की शक्ति, पुरुषार्थ
23हंसविवेक शक्तिउज्जवल कीर्ति, आत्म-संतोष, दूरदर्शिता, सत्संगति, सत्-असत् का निर्णय लेने की क्षमता, उत्तम आहार-विहार
24यात्तुलसीसेवा शक्तिलोकसेवा में रुचि, सत्यनिष्ठा, पातिव्रत्यनिष्ठा, आत्म-शान्ति, परदु:ख-निवारण

गायत्री मंत्र के इन 24 अक्षरों में समाहित 24 देवता और उनकी शक्तियां व्यक्ति के जीवन को संतुलित, समृद्ध और आनंदमय बनाते हैं। इसके नियमित जाप से सभी शक्तियों और सिद्धियों का लाभ प्राप्त होता है।

गायत्री मंत्र की व्याख्या

मन और प्राण के सम्बन्ध की व्याख्या गायत्री मंत्र को इष्ट है। सविता मन प्राणों के रूप में सभी कर्मों का अधिष्ठाता है। इसे गायत्री के तीसरे चरण में कहा गया है – “धियो यो न: प्रचोदयात्”। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार, “कर्माणि धिय:” – धी या बुद्धि तत्त्व केवल विचार नहीं बल्कि उन विचारों का कर्मरूप में मूर्त होना है। यह मन की शक्ति का प्रतीक है।

गायत्री मंत्र की तीन व्याहृतियाँ

गायत्री मंत्र की तीन व्याहृतियाँ (भूर्भव: स्व:) भी महत्वपूर्ण हैं:

  • भू: पृथ्वीलोक, ऋग्वेद, अग्नि, पार्थिव जगत् और जाग्रत् अवस्था का सूचक है।
  • भुव: अंतरिक्षलोक, यजुर्वेद, वायु देवता, प्राणात्मक जगत् और स्वप्नावस्था का सूचक है।
  • स्व: द्युलोक, सामवेद, आदित्यदेवता, मनोमय जगत् और सुषुप्ति अवस्था का सूचक है।

गायत्री मंत्र का महत्व

गायत्री मंत्र को आत्मिक उन्नति और मानसिक शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके जाप से मनुष्य को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. आध्यात्मिक शुद्धि: यह मंत्र आत्मा को शुद्ध करता है और मन को शांत करता है।
  2. बुद्धि का विकास: यह मंत्र बुद्धि और विवेक को प्रखर बनाता है।
  3. ध्यान और एकाग्रता: इसके नियमित जाप से ध्यान और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  4. सकारात्मक ऊर्जा: यह मंत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और नकारात्मक विचारों को दूर करता है।
  5. आत्मबल: यह आत्मबल को बढ़ाता है और आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

गायत्री मंत्र का जाप कैसे करें

गायत्री मंत्र का जाप करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाई जा सकती है:

  1. स्वच्छता: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान: एक शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  3. मुद्रा: ध्यान मुद्रा में बैठें और अपनी आंखें बंद करें।
  4. मंत्र उच्चारण: धीरे-धीरे और स्पष्ट रूप से मंत्र का उच्चारण करें।
  5. एकाग्रता: मंत्र जाप करते समय अपनी एकाग्रता मंत्र के शब्दों और उनके अर्थ पर केंद्रित करें।
  6. संकल्प: मंत्र जाप से पूर्व एक संकल्प लें कि आप इसे पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करेंगे।

FaQs

गायत्री मंत्र का देवता कौन है?

गायत्री मंत्र का प्रमुख देवता सूर्य देव होते हैं। यह मंत्र सूर्य की पूजा, स्तुति और आराधना के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

मंत्रों का राजा कौन सा मंत्र है?

मंत्रों का राजा गायत्री मंत्र माना जाता है। इस मंत्र का जाप उच्च ध्यान और साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

गायत्री मंत्र कितने दिन में सिद्ध हो जाता है?

गायत्री मंत्र को सिद्ध करने के लिए चौबीस लाख बार जप करना आवश्यक होता है। इसे एक पुरश्चरण कहा जाता है और इसमें ब्रह्म मुहूर्त से लेकर दोपहर तक अनवरत जप करना पड़ता है। यह प्रक्रिया कुल में लगभग 2.5 से 3 साल तक का समय ले सकती है। गायत्री पुरश्चरण पद्धति का अनुसरण करने से प्रक्रिया सरल और संगठित होती है।

गायत्री की सिद्धि करके मनुष्य क्या कर सकता है?

गायत्री मंत्र से भलीभांति नियमित जप करने वाला किसी भी अन्य मंत्र से बढ़कर पवित्र हो सकता है। तीन वर्ष तक इस मंत्र का नियमित जप करने वाले को ईश्वर का अनुभव हो सकता है।

Leave a Comment

Ads Blocker Image Powered by Code Help Pro

Ads Blocker Detected!!!

We have detected that you are using extensions to block ads. Please support us by disabling these ads blocker.

Powered By
100% Free SEO Tools - Tool Kits PRO
error: Content is protected !!